बृहस्पतिवार, 11 मार्च 2010

एकालाप ,,,,,,,,,,,,,


आज बस लिखना है .. संतोष के खातिर .. कभी कभी अपने को लिखना है , चिटके सपने को लिखना है .. आज 
पहली बार इतनी शिद्दत से महसूस कर रहा हूँ कि ब्लॉग अपना घर होता है .. बाहर से थके हारे आते हैं और 
बाहरी वस्त्र उतार कर तौलिया बाँध कर कुछ शब्द-दाने चुगने बैठ जाते हैं , थके हारे को ज़रा सा इत्मिनान मिल 
जाता है , इतना क्या कम है !.. कुछ शब्द-दाने चुगने को उद्यत हूँ .. आज हमसे लेखन में विधा-विभाजन नहीं सध पायेगा .. बस कुछ लिख जाय और अनुद्विग्न स्थिति को प्राप्त हो जाऊं किसी तरह ! .. 
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बाहर की दुनिया के  सापेक्ष बनती है एक अन्दर की दुनिया ;
जहाँ कुछ फूल सजाते हैं हम कांटे के साथ संतुलन बनाते हुए !
इन अमर-फूलों को अमर-काँटों के साथ ऐसा निर्वाह देते हैं कि 
एक बसंत निर्मित होता है , जिसको ताउम्र बहार के लिए तैयार 
रखते हैं , पर कभी - कभी बसंत - असंतुलन रुला जाता है , तब 
करनी पड़ती है आत्मसमीक्षा , जिससे बनता जाता है एक 
आत्मालाप-आत्मप्रलाप-एकालाप-रवालाप-भावालाप !
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कभी कभी हम भावों के साथ करते हैं अन्याय 
उसे तलवार समझ लेते हैं और उसपर चढ़ाते जाते 
हैं बुद्धि की शान , पहटते रहते हैं जाने-अनजाने वहां तक 
जहाँ पर चीजें नुकीली होकर बिच्छू का डंक बन जाती हैं 
और फिर हम अभिशप्त से डंक मारते रहते हैं शेष जीवन !
.
अपनी एक जोड़ी आँखें जब कम लगें तो यह समझ लेना चाहिए 
कि नैसर्गिक अन्याय मैंने शुरू कर दिया है , तत्क्षण कुछ अच्छा 
भले लगे पर बाद में पीड़ा होगी ही ,, जागने पर पता चलता है कि 
बहुत देर हो चुकी होती है और समय पीछे से चंदुला होता है जिसकी 
गर्दन कोई पकड़ नहीं पाया और बाल पकड़ में आयेगा नहीं !
.
निरहंकार होने का अहंकार भी कम मादक और सारहीन नहीं होता !
यह ज्यादा सूक्ष्म और कारण अहंकार है .. इसके प्रभाव में कोई 
दुम सीधी करने निकलता  हूँ और पाता हूँ कि मेरी और 
मेरी भाषा की दुम और भी ज्यादा टेढ़ी हो गयी है .. परिवेश भी दे 
देता है 'टोंकारी-उस्ताद' की संज्ञा , फिर कौन देखता है कि यह टोंकारी
उस्ताद बीच में खड़ा होकर कितने वार झेलता है , वार जो ह्रदय मारता 
है बुद्धि पर और बुद्धि मारती है ह्रदय पर ! ... ज्यादा बोलने  पर महाभारत 
के पात्र 'बर्बरीक' जैसा गला कटवाना पड़ता है , और फिर भी महाभारत 
देखने की इच्छा शेष रह जाती है ! धन्य है नियति !
.
पीढ़ी की पीढ़ी पायमाल कर दी गयी है ! सुख की एक बूँद पाना भी 
भारू हो गया है ! सुख की तलाश महानगरीय संस्कृति में बूढ़ी बना 
दी गयी इक्कीस वर्षीय बालिका की आँखों में प्यार की तलाश जैसा 
नामुमकिन हो गया है ! फिर जीना इसी का नाम है ! 
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अंततः एक ही यथार्थ बचता है शेष , जिसे भर्तृहरि के शब्दों में कहूँ तो ;
'' कालो न याता वयमेव याता ... '' 

17 टिप्पणियाँ:

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

सब कुछ बदल रहा है भाई..न्याय और अन्याय की बातें तो कुछ लोगों तक सिमट कर रह गई है..

Arvind Mishra ने कहा…

एकालाप नहीं आत्मालाप कहिये !

Udan Tashtari ने कहा…

जो भी हो, जैसा भी हो...आलाप बढ़िया रहा.

Divya Srivastava ने कहा…

Amar ji,

Introspection is as necessary as oxygen and water in our life. Without introspection all philosophies are incomplete.we will never come to know about both the aspects of coin in all walks of life.

Fortunate are they who get an oppotunity to introspect . Most of us do not even bother about what is right and what is wrong.

Introspection is like "rotation of crop" by which a perfect balance of nutrients is maintained in the soil. Likewise we also find solace in it and all the five senses reach an equilibrium.

Your blog is representing your mental state. We all go through such circumstances and we always come out victorious after such self analysis.

Hardships makes us strong and stronger. "Sona tap kar hi kundan banta hai" . So do not be troubled by the bitter facts of life.

"When the going gets tough, let the tough get going "

हेमन्त कुमार ने कहा…

"अपनी एक जोड़ी आँखें जब कम लगें तो यह समझ लेना चाहिए कि नैसर्गिक अन्याय मैंने शुरू कर दिया है , तत्क्षण कुछ अच्छा भले लगे पर बाद में पीड़ा होगी ही ।"

सचमुच ! यथार्थ बोध ही मार्ग प्रशस्त करता है ।
आभार ।

मनोज कुमार ने कहा…

भलौ भलाईहि पै लहर लहर निचाइहि नीचु ।
सुधा सराहिअ अमरता गरल सराहिअ मीचु
भला भलाई ही ग्रहण करता है और नीच नीचता को ही ग्रहण किए रहता है। अमृत की सराहना अमर करने में होती है और विष की मारने में।

डॉ .अनुराग ने कहा…

दिलचस्प लिखे हो भाई.समय के बारे ....निरंकार ओर अहंकार के बारे में .भाषा तो खैर कब से अपनी दम को टेडा घोषित कर चुकी है ओर आखिरी लाइन तो बहुत ही जबरी है ...
सुख की तलाश महानगरीय संस्कृति में बूढ़ी बना
दी गयी इक्कीस वर्षीय बालिका की आँखों में प्यार की तलाश जैसा
नामुमकिन हो गया है ! फिर जीना इसी का नाम है ! ..........
बड़ा दुरूह काम है इन दिनों जीना भी....

पारूल ने कहा…

जागने पर पता चलता है कि
बहुत देर हो चुकी होती है और समय पीछे से चंदुला होता है जिसकी
गर्दन कोई पकड़ नहीं पाया और बाल पकड़ में आयेगा नहीं !

theek baat ..yahi ek shay hai jise qabu karna namumkin

shikha varshney ने कहा…

आपके लिखने का अंदाज और भाषा शैली मन मोह गई...बेहतरीन अभिव्यक्ति है...शानदार

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
इसे 13.03.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह ०६ बजे) में शामिल किया गया है।
http://chitthacharcha.blogspot.com/

अनूप शुक्ल ने कहा…

बहुत खूब आलाप हुआ भाई! कुछ तो शानदारै हैं। ऐसे आत्मालाप समय-समय करते रहना चाहिये विचार-तौलिया बांधकर। जय हो!

गिरिजेश राव ने कहा…

इतने न डूबो भाई, कुछ आलस किया करो।
ऐसा पढ़ कर अपने आलस पर खीझ आने लगती है। कुछ तो खयाल करो। :)
मात्रा में आलस ठीक है, गुणवत्ता में नहीं। यहाँ मिली इस सीख को गँठिया लिया है।

अपूर्व ने कहा…

भाई अमरेंद्र जी, पढ़ तो पहले ही गया था..मगर थाह नही मिल रही थी..अंदर उतरने से भी डर लगता था..और अब जब फिर अच्छे से बांचा गया तो कुछ कहने लायक भी नही रहा...बहुत कुछ सीख कर जा रहा हूँ..पैनी बुद्धि के विष-दंशों से ले कर निरंकारता का अहंकार और महानगरीय संस्कृति के बीच टोंकारी उस्ताद..काफ़ी कुछ ऐसा है जो छीलता है और नये वितान खोलता है..सहेज कर रखने और बारम्बार मनन करने लायक बातें..खैर गुरुज्ञान आगे भी मिलता रहेगा यह उम्मीद है...

ई-गुरु राजीव ने कहा…

जीना इसी का नाम है :) शिक्षाप्रद आलेख. विचार करूंगा इस पर..........

shama ने कहा…

Bapre baap..! Lekhani hai ya talwaar!

हिमान्शु मोहन ने कहा…

आपकी रचना पढ़ी, पूरी पढ़ने की आदत होने का लाभ मिला। आपकी मानसिक प्रसव पीड़ा का अनुभव हुआ अत: सहानुभूति भी जागी।
लाभ यह मिला कि अपनी एक पुरानी छोटी बह्र की ग़ज़ल के एक शे'र का भाव दिखा, भर्तृहरि की उक्ति में -
मेरा शे'र है-
बीतता है आदमी,
बीतता यौवन नहीं

आप को इस सृजन हेतु बधाई!

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

बिलकुल दिल खोल के धर दिया है,कबीर दास जी के शब्दों में कहें तो 'जस की तस धर दीनी चदरिया' !अपने को ज़बरई उड़ेलना और रूहानी-टच के साथ लिखना बहुत फ़र्क पैदा करता है.आप ऐसे ही लिखते रहें,अपनी थकावट तो दूर करेंगे ही,हम सब भी लहा-लोट हो जायेंगे !